Thursday, May 31, 2012

मेरा भारत महान


कहना बहुत आसान है, लेकिन सही में इसे महसूस करना बहुत मुस्किल है | मेरी पैदाइश शिक्षको के घर हुआ है और दिल से ये सोचता हूँ की आज के भारत को अगर सबसे ज्यादा किसी बदलाव की जरुरत है तो वो है बुनियादी शिक्षा में | हम आज भी उस पद्धति को चला रहे हैं जो सिर्फ अफसर बनाती है जीना नहीं सिखाती | हम अपने मौलिक अधिकार के बारे में सिखाती है, मौलिक कर्तव्यों के बारे ने नहीं. हमे ये बताती है हम इस देश से क्या ले सकते हैं लेकिन ये कहीं नहीं सिखाती की कैसे हम इस देश को वापस दे सकते हैं. हम इस सिक्षा पद्धति को इसलिए अपनाया था क्यूंकि आजादी के वक़्त निति निर्धारकों ने ये सोचा था की इतनी मुस्किल से आजादी मिली है इस देश की जनता खुद अपने कर्तव्यों के बारे में सोचेगी, उनका पालन करेगी लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं है. वक़्त के साथ हर चीज बदलती है और उसके साथ बदलनी चाहिए उन चीजों को बनाने वाली, उन्हें सँवारने वाली पद्धति. हम सब ये मानते हैं बच्चे जैसे होंगे देश वैसा बनेगा क्यूंकि बच्चा जिस चीज को सीखेगा, जैसा उससे सिखाया जायेगा वो बड़ा होके वैसा ही बनेगा और पूरी की पूरी Generation जैसी होगी देश वैसा ही होगा. और आज के वक़्त में सबसे ज्यादा कुछ उपेछित है तो वो है हमारी सिक्षा पद्धति. आप नहीं मानते इस बात को चलिए गौर फरमाते हैं कुछ बातों पे:
१. शिक्षकों की संख्या: आज के वक़्त में शिक्षकों की संख्या इतनी कम् है चाहे वो प्राथमिक स्कूल हो या माध्यमिक या फिर विश्व विद्यालय . हर जगह शिक्षकों की कमी है. ये माना जाता है की हर २०-२५ बच्चे पे १ शिक्षक होना चाहिए . और आज के भारत की हालत ये है की २०-२५ बच्चे तो छोरिये कम से कम ५० बच्चों पे शिक्षक का १ पद स्वीकृत है और उसमे से भी आधे खली हैं . आप सोच ही सकते हैं की बच्चे क्या ही पढ़ते होंगे और शिक्षक क्या ही पढ़ते होंगे. और तो और इन शिक्षकों को भी जनगणना करनी होती है पशु गणना और पता नहीं क्या क्या? भारत सरकार ने स्कूलों बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए मध्यान भोजन की व्यवस्था कर दी लेकिन उसकी जिम्मेवारी भी दाल दी शिक्षकों के ऊपर. इसका मतलब ये है की अगर उन्हें थोडा बहुत भी मौका मिल पाता था, स्कूल में रहने का अब वो भी बाकी दफ्तरों के चक्कर लगाओ, कबी चावल लेने, कभी कोई रिपोर्ट देने, कभी कुछ तो कभी कुछ. अब शिक्षक जिन्हें आपने पढ़ने के लिए रखा हुआ है, जिनका काम है इस देश का भविष्य बनाना उनको शायद ही कभी पढ़ाने का मौका मिलता है . और अगर ऐसे बच्चे कल देश की मुख्या धारा में आयेंगे तो देश का तो भगवान् मालिक है. ये था प्राथमिक शिक्षकों की गाथा. अगर आप सोचते हो की विश्व विद्यालयों में कहानी दूसरी है तो वहां की हालत और गयी गुजरी है. Professors के पद स्वीकृत हैं कोई ५० साल पहले के जनगणना के आधार पे और उनमे भी ५०% से ज्यादा पद रिक्त हैं. अगर आप सोच रहे हो की ये सिर्फ State Universities की हालत है तो ऐसा नहीं है . कोई भी IIT, NIT , IIM , AIIMS कहीं भी देख लो आलम यही है . हमने कबी संसद का कोई पद रिक्त नहीं देखा होगा. किसी भी सीट के खाली होते ही  उससे ६ महीने के अन्दर उससे भर लिया जाता है लेकिन शिक्षकों के इन खाली पड़े पदों को भरने के लिए कोई भी सरकार ना कदम उठाती है ना ही कुछ सोचती है. आज क इस वक़्त में अगर भारत की सिक्षा पद्धति को सही में अगर बदलना है तो सबसे पहले आज क बच्चों के जनगणना के आधार पे शिक्षकों के पद स्वीकृत करने के बाद उन्हें तत्काल भरना चाहिए. वैसे तो हर प्राथमिक स्कूल या हर २०० बच्चों में १ non -teaching स्टाफ  होना चाहिए.  लेकिन अगर भारत सरकार हर २५ बच्चे पे १ शिक्षक भी उपलब्ध करा दे तो आज कायापलट हो जाये.

२. स्कूल भवन: २०० बच्चों के बैठने के लिए सरकार देती है २ कमरों का १ स्कूल . अरे अगर ५ क्लास हैं १ स्कूल में तो कम से कम ५ कमरे तो होने ही चाहिए बच्चों के बैठने के लिए. अपने नेताओं को चुनाव जीतते से बड़ा सा बंगला चाहिए होता है जिससे वो चुनाव हारने के बाद भी वापस नहीं करते. लेकिन वहीँ इन छोटे छोटे बच्चों के दिन भर बैठने के लिए १ छत तक नहीं होती. अगर कोई सोच रहा है की आज के वक़्त में ऐसा हो ही नहीं सकता, तो मै कह दूँ की आज के गाँव में कुछ नहीं बदला है हाँ थोडा सा बदलाव है, लेकिन बच्चों के बढ़ते संख्या के साथ वो सुविधाएं कहीं गूम हो जाती है. अगर हम विश्व के सुविधाओं को मानक मानें तो कम से कम हरेक क्लास के लिए कम से कम १ कमरा, शिक्षकों को बैठने के लिए १ कमरा, शौचालय और साथ में खेलने के लिए १ मैदान. तो हम कह सकते हैं की कम से कम प्राथमिक विद्यालयों को २ की जगह ५ कमरे, २ शौचालय और १ खेलने का मैदान. जबकि उच्चा विद्यालयों (६-१० class) १० कमरे और बाकी सुविधाएं तो अभी के अभी चाहिए. सरकार का सबसे आसान बहाना होता है की वो ये सुविधएं देना तो चाहती है लेकिन उसके पास जगह नहीं है. सर्कार अगर चाहे तो वो कहीं भी जगह खरीद के भवन बना सकती है अगर इच्कासक्ति हो तो. लेकिन शायद किसी में वो इच्छा शक्ति है ही नहीं या फिर वो जान बूझ कर ऐसे करना नहीं चाहते.

क्रमशः ...